पांच कैलाशों में शामिल किन्नर कैलाश की यात्रा हुई शुरू, बम भोले के जयकारों से गूंज उठे पर्वत

बेहद दुर्गम धार्मिक यात्राओं में शामिल ऐतिहासिक किन्नर कैलाश तीर्थयात्रा आधिकारिक तौर पर शुरू हो चुकी है। पर्वतीय इलाके में हर तरफ बम भोले की गूंज सुनाई दे रही है। दस दिन तक चलने वाली इस वार्षिक यात्रा के लिए करीब 450 भक्तों का पहला जत्था हिमाचल प्रदेश  के किन्नौर आधार शिविर से रवाना हो गया है। बीती 28 जुलाई को कुछ तीर्थयात्री बिना प्रशासन की घोषणा के दर्शन को निकल पड़े थे, लेकिन रास्ते में अचानक बाढ़ और भूस्खलन से दो भक्तों की मौत हो गई थी। काफी मशक्कत से 251 को बचा लिया गया था। इसके बाद यात्रा रोक दी गई थी।
भक्तों का पहला जत्था गुरुवार को किन्नौर जिले के रेकांगपिओ मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर स्थित तांगलिंग गांव के आधार शिविर से रवाना हुआ है। किन्नौर के कार्यवाहक उपायुक्त और एसडीएम कल्पा के अनुसार मौसम की स्थिति के आधार पर तीर्थयात्रा 11 अगस्त तक चलेगी। मौसम खराब होने पर यात्रा एक-दो दिन के लिए रद भी की जा सकती है।
इस बार जिला प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए हैं। भक्तों की सुविधा के लिए तंबू और चिकित्सा शिविर लगाए गए हैं। आधार शिविर में ही नियंत्रण कक्ष बनाया गया है। रात्रि ठहराव गणेश पार्क में है। दूसरे दिन गणेश पार्क से गणेश गुफा तक यात्रा होगी। यहां श्रद्धालु पार्वती कुंड के दर्शन करेंगे। तीसरे दिन गुफा से किन्नर कैलाश पहुंच जाते हैं। चौथे दिन वापस आधार शिविर पहुंचते हैं। यहां खाने-पीने का इंतजाम भी है।

बेहद दुर्गम सफर  

किन्नौर जिला मुख्यालय से सात किलोमीटर दूर पोवारी से सतलुज नदी पार कर ठोलिंग गांव से होकर यहां जाना पड़ता है। गणेश पार्क से 500 मीटर की दूरी पर पार्वती कुंड है। श्रद्धालु यहां स्नान करने के बाद 24 घंटे की कठिन यात्रा करके किन्नर कैलाश पहुंचते हैं। भक्तों को करीब 14 किलोमीटर का पथरीले और अति दुर्गम रास्ते से होकर जाना पड़ता है। पांच कैलाशों में से एक किन्नर कैलाश की यात्रा को अमरनाथ यात्रा से भी कठिन माना जाता है।

दिन में सात बार रंग बदलता है 79 फीट ऊंचा शिवलिंग

किन्नर कैलाश यात्रा समुद्र तल से 6,050 मीटर ऊंचाई पर स्थित प्राकृतिक चट्टान से निर्मित भगवान शिव के 79 फुट ऊंचे शिवलिंग को समर्पित होती है। करीब 24,000 फीट की ऊंचाई पर प्राकृतिक रूप से स्थापित शिवलिंग तक पहुंचने में तीन दिन लगते हैं।
मानसरोवर कैलाश के बाद किन्नर कैलाश को दूसरा कैलाश कहा जाता है। भगवान शिव की तपोस्थली किन्नौर के किन्नर कैलाश की चौड़ाई 16 फीट बताई जाती है। सूरज की रोशनी पड़ने से यह शिवलिंग दिन में सात बार अपना रंग बदलता हैं।

किन्नर कैलाश की मान्यता

किन्नर कैलाश के बारे में कई मान्यताएं हैं। माना जाता है कि महाभारत काल में कैलाश का नाम इंद्रकील पर्वत था। यहां भगवान शंकर और अर्जुन का युद्ध हुआ था और अर्जुन को पशुपात अस्त्र की प्राप्ति हुई थी। यह भी कहा जाता है कि पांडवों ने वनवास काल का अंतिम समय यहीं पर गुजारा था। यह भी माना जाता है कि किन्नर कैलाश की गोद में ही भगवान कृष्ण के पोते अनिरुध का विवाह ऊषा से हुआ था। इस स्थान पर आम लोगों के जाने पर प्रतिबंध था। वर्ष 1993 में इसे श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए खोला गया। इस यात्रा के बारे में कहा जाता है कि अपने जीवन काल में एक शख्स एक ही बार यहां पहुंचने की हिम्मत जुटा पाता है।
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