सबसे ज्यादा भूत-प्रेत वाली 25 जगहों में शामिल है ऐतिहासिक पर्यटन स्थल डगशाई 

शांति की तलाश में निकले पर्यटकों के लिए डगशाई से अच्छा कोई स्थान नहीं हो सकता

लोकप्रिय पर्यटन स्थलों की भीड़भाड़ से दूर शांति की तलाश में निकले पर्यटकों के लिए डगशाई से अच्छा कोई स्थान नहीं हो सकता। हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित यह कस्बा भारत के सबसे पुराने कंटोनमेंट ऐरिया में से एक है। यहां कोई साइबर कैफे नहीं है। आजकल पहली पसंद बन चुके फास्ट फूड प्वाइंट या रिजाॅर्ट भी यहां देखने को नहीं मिलेंगे। यहां की गलियों में गाड़ी तक नहीं घुस सकती। यानी आपकी शांति में खलल डालने वाला कुछ ऐसा यहां नहीं मिलेगा जो अन्य शहरों में चिल्ल-पों मचाए हुए है। खास बात यह है कि यहां का कब्रिस्तान भारत के सबसे ज्यादा भूत-प्रेत वाली 25 जगहों में शामिल है। यहां से जुड़ी कई डरावनी कहानियां स्थानीय लोगों की जुबां पर रहती हैं। दिन में भी यहां आदमी ढूंढे नहीं मिलते। यहां स्थित कई ऐतिहासिक चर्च हैं, जो दुनियाभर में मशहूर हैं। यहां पर्यटक जरूर आते हैं।

क्यों आएं डगशाई

सोलन से 11 किलोमीटर दूर और समुद्र तल से 5689 फीट की ऊंचाई पर स्थित डगशाई की ठंडी हवाएं न केवल फेफड़ों को स्वच्छ ऑक्सीजन से साफ-सुथरा कर देती हैं, बल्कि यहां के खूबसूरत समृद्ध ऐतिहासिक नजारे आंखों को भरपूर सुकून देते हैं। यह जादुई इलाका शिमला को जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 22 के बिल्कुल पास स्थित है।
इस छोटे से शहर की बहुत बड़ी खूबी यह है कि यहां की दुकानें और सड़कें उसी तरह हैं जैसी 1847 में थी। उनमें जरा भी बदलाव नहीं किया गया है। दुहरे-तिहरे लकड़ी के मुड़ने वाले दुकानों के दरवाजे, पतली-पतली पत्थर बिछी गलियां आकर्षक लगती हैं। ये इतनी पतली हैं कि इनमें से कार तक नहीं गुजर सकती।

क्या है खास आकर्षण

बहुत कम आबादी वाले इस कस्बे में कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे यहां कोई रहता ही नहीं है। बेहद शांत, हरा-भरा, खाली-खाली और टेड़ी-मेढी खूबसूरत गलियां, लकड़ी के किवाड़ वाली छोटी-छोटी दुकानें, यानी यहां आने वाले पर्यटकों को ऐसा महसूस होता है जैसे वे पौने दो सौ साल पुराने समय में पहुंच गए हों और उन्हें उस समय का इतिहास अपनी आंखों के सामने दोहराता हुआ सा दिखता है।

यहां का एक और आकर्षण सेल्यूलर जेल म्यूजियम भी है। भारत में दो सेल्यूलर जेल थीं। एक यहां और दूसरी अंडमान निकोबार में। यह जेल 1849 में बनी थी। उस समय 72,873 रुपये से बनी इस जेल में कुल 54 कोठरियां थीं। इनमें 16 काल कोठरियां थीं। इनमें न तो रोशनी थी और न ही साफ हवा की व्यवस्था थी। इस जेल में एक रात के लिए महात्मा गांधी भी रुके थे। वर्ष 1920 में जब एक आयरिश सैनिक जेम्स डेली को सैन्य अपराध के लिए फांसी दी गई थी, तो उसके पक्ष में एकजुटता दिखाने के लिए गांधी ने स्वेच्छा से यहां एक रात बिताई थी।

भूत-प्रेतों वाला कब्रिस्तान 

कैंटोनमेंट रोड के नजदीक एक कब्रिस्तान है, जो यहां आने वाले पर्यटकों के बीच खासा लोकप्रिय है। यहां का शांत माहौल, मोटी-मोटी शाखाओं वाले लंबे-लंबे पाइन के पुराने पेड़ ऐसे घने हैं कि सूरज की रोशनी तक इनसे नहीं छन सकती। हवा से पेड़ों की चर-चर की आवाज बेहद डरावना माहौल बना देती है। खास बात यह है कि यहां का कब्रिस्तान भारत के सबसे ज्यादा भूत-प्रेतों वाली 25 जगहों में शामिल है। इस कब्रिस्तान में दफन एक ब्रिटिश अधिकारी की आठ महीने की गर्भवती पत्नी की कब्र जिसे मेम की कब्र कहा जाता है, स्थानीय व विदेशी पर्यटकों के बीच चर्चा का विषय रहती है। महिलाएं यहां बच्चे का सुख पाने के लिए आशीर्वाद मांगने आती हैं।

डगशाई का इतिहास

डगशाई मुगल काल का गांव है। पटियाला के महाराजा द्वारा पांच गांव दिए जाने के बाद अंग्रेजों ने इस इलाके को अपने रहने-सहने के हिसाब से संवारा-सजाया था। शुरुआत में अंग्रेजों ने यहां तपेदिक के इलाज के लिए अस्पताल बनवाया था।
डगशाई नाम दाग-ए-शाही से आया है जिसका अर्थ है वह शाही चिह्न जिसे अपराधी के माथे पर लगाया जाता था। अपराधी को गिरफ्तार कर यहां लाया जाता है था और यहां पहचान के लिए उसके माथे पर एक चिन्ह लगा दिया जाता था। बाद में यह सैन्य गतिविधियों का अड्डा बन गया और नाम भी दागे शाही से डगशाई हो गया।

कैसे पहुंचें : 

दिल्ली से लगभग 242 किलोमीटर दूर डगशाई तक ट्रेन, बस या हवाई जहाज से पहुंचा जा सकता है। दिल्ली से सोलन और वहां से डगशाई आराम से जा सकते हैं। राजधानी दिल्ली से यहां तक का सफर पांच घंटे में पूरा हो जाता है।

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