बहुरेंगे ऊना के ऐतिहासिक सदाशिव मंदिर के दिन, सरकार ने ली देखभाल की जिम्मेदारी

हिमाचल प्रदेश सरकार ने ऊना के ऐतिहासिक सदाशिव मंदिर का अधिग्रहण कर लिया है। डेढ़ सौ साल पुराने इस मंदिर का विकास देश के अन्य मशहूर मंदिरों की तरह होगा और उन्हें पूजा के साथ-साथ पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाएगा। दिल्ली-धर्मशाला हाईवे पर स्थित बरूही से यह मंदिर करीब 16 किलोमीटर दूर बही गांव में है। ध्यूंसर पर्वत पर स्थित मंदिर के अधिग्रहण का फैसला हाल ही में हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया। जिला ऊना के कुठलैहड़ के तलमेहड़ा स्थित सदाशिव मंदिर के अधिग्रहण पर सरकार लंबे समय से गंभीरता से विचार कर रही थी।ठ
सरकार के इस फैसले के बाद सदाशिव मंदिर की व्यवस्था राज्य प्रशासन की देखरेख में होगी। हाल ही में सरकार ने ऊना में ही स्थित ऐतिहासिक चिंतपूर्णी मंदिर का अधिग्रहण किया था। सदाशिव मंदिर में सप्ताह में करीब पांच से सात लाख रुपये तक चढ़ावा आता है। कला, भाषा एवं संस्कृति विभाग के सचिव के अनुसार मंदिर की देखरेख अब एक कमेटी के हाथ में होगी। यहां काफी समय से मंदिर ट्रस्ट के दो गुटों में व्यवस्था को अपने हाथ में लेने के लिए विवाद था।
एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार जिला प्रशासन को अभी सरकार के नोटिफिकेशन की काॅपी नहीं मिली है। अधिग्रहण का नोटिफिकेशन मिलते ही मंदिर के विकास का विस्तृत मास्टर प्लान बनाया जाएगा। अब दान में आई राशि को बिना अनुमति खर्च नहीं किया जा सकेगा। प्रदेश सरकार ने अब तक कुल 36 मंदिरों का अधिग्रहण कर लिया है। शिमला जिले के सराहन का मां भीमाकाली मंदिर, हाटकोटी मंदिर सहित कई ऐतिहासिक मंदिर शामिल हैं।
देवभूमि हिमाचल का शांत प्राकृतिक माहौल दुनियाभर से पर्यटकों, क्लाइम्बर्स और भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां पहाड़ों की गोद और चोटियों पर हजारों मंदिर हैं। इस मंदिर को भगवान शिव का वास कहा जाता है। यह पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। यहां आने के लिए पहले बरूही पहुंचना पड़ता है। वहां से आसान रास्ता है। यहां की खासियत यह है कि मंदिर के पास से गुजरने वाला हाईवे बेहद अच्छी हालत में है और दिल्ली से सड़क मार्ग से जाते हुए कोई दिक्कत नहीं होती। सदाशिव मंदिर की विशेष धार्मिक मान्यता है। यहां साल भर लाखों श्रद्धालु नमन करने और भगवान शंकर की आराधना करने के लिए पहुंचते हैं।

मंदिर का इतिहास

कहा जाता है कि करीब 5,500 वर्ष पहले महाभारत काल में पांडवों के पुरोहित श्री धौम्य ऋषि ने ध्यूंसर पर्वत पर शिव की तपस्या की थी। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर दर्शन दिए और उनसे वर मांगने को कहा था। ऋषि ने वर मांगा कि इस पूरे क्षेत्र में आकर उनके द्वारा स्थापित किए गए ध्योमेश्वर शिव की पूजा करने वालों की मनोकामनाएं पूरी हों। मान्यताओं के मुताबिक भगवान शिव तथास्तु कह कर अंतध्र्यान हो गए। प्राचीन काल में स्थापित किए गए शिवलिंग को ध्यूंसर सदाशिव के नाम से जाना जाता है।

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