चार धाम और पंच केदारों में से एक है रूद्रप्रयाग में स्थित केदारनाथ मंदिर

देवों की भूमि कही जाने वाले उत्तराखंड में केदारनाथ पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित केदारनाथ मन्दिर एक प्रमुख तीर्थस्थल है। विशेषतौर पर हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले लोगों के बीच इस प्रसिद्द धार्मिक स्थल का विशेष महत्व है। प्रदेश के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित केदारनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंग में से एक है। यहीं कारण है कि इस धार्मिक स्थल को चार धाम और पंच केदार में से एक माना जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह विशाल मंदिर भूरे रंग के कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। मंदिर का निर्माण लगभग 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर किया गया है। केदारनाथ मंदिर में स्थित ज्योतिर्लिंग की ऊंचाई 3584 मीटर है। यह बारहों ज्योतिर्लिंगों में सबसे महत्वपूर्ण है।

केदारनाथ मंदिर तीन पहाड़ों (केदारनाथ, खर्चकुंड, भरतकुंड) से घिरा हुआ है। इसके अलावा यहां पर पांच नदियों (मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी) का संगम भी है। हालांकि इनमे से कुछ नदियों का अस्तित्व अब नहीं है, लेकिन मंदाकिनी नदी आज भी मौजूद है। 1000 साल से भी अधिक प्राचीन केदारनाथ मंदिर का निर्माण पांडव वंश के जन्मेजय ने कराया था। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इस मंदिर की स्थापना आदिगुरू शंकराचार्य ने की थी। मंदिर के प्रार्थना हॉल की आन्तरिक दीवारों पर विभिन्न हिन्दू देवी देवताओं के चित्र देखे जा सकते हैं। श्री केदारनाथ मंदिर में शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में पूजे जाते है।

पौराणिक कथा

एक कथा के अनुसार भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और केदारनाथ में ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। एक अन्य कथा के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद पांडव अपने पापों से मुक्ति पाकर मोक्ष को प्राप्त करना चाहते थे, क्योंकि युद्ध के दौरान उनके हाथों से अपने परिवारजनों और ब्रह्म हत्या हुई थी। भगवान श्री कृष्ण की सलाह पर पांडव भगवान शिव से माफ़ी मांगने वाराणसी पहुंचे। युद्ध के दौरान हुई अन्यायपूर्ण घटनाओं के कारण भगवान शिव पांडवों से नाराज थे, इसलिए भगवान शिव केदार आ गए और नंदी का रूप धारण करके अन्य पशुओं में जा मिले। जब पांडवों को संदेह हुआ तो भीम ने विशाल रूप धारण कर दो पहाड़ों पर पैर फैला दिए।

इसके बाद जब पशुओं को भीम के पैरों के नीचे से निकाला गया तो अन्य पशु तो निकल गए लेकिन भगवान शिव जाने के लिए तैयार हुए। जब भीम ने नंदी रूपी भगवान शिव की पूंछ पकड़ने की कोशिश कि तो नंदी भूमि में अंतर्ध्यान करने लगा। तब भीम ने बैल का पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शिव पांडवों की भक्ति देख प्रसन्न हुए और उन्हें पापों से पुक्त कर दिया। अंतर्ध्यान होने के बाद उनके धड़ से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। आज यहां पशुपतिनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। इसके अलावा भगवान शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मध्यमाहेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुई। इसलिए श्री केदारनाथ सहित इन जगहों को पंचकेदार कहा जाता है। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ धाम में पूजे जाते हैं।

कैसे पहुंचें केदारनाथ मंदिर

केदारनाथ पहुंचने के लिए आप यहां सड़क, ट्रैन और हवाई जहाज़ से पहुंच सकते हैं। केदारनाथ से नजदीकी हवाई अड्डा देहरादून और निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश में स्थित है। सड़क मार्ग द्वारा केदारनाथ मंदिर तक जाने के लिए ऋषिकेश, हरिद्वार और देहरादून से वाहन उपलब्ध हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!