2000 साल से भी अधिक पुराना है ऋषिकेश का यह मंदिर, अपने आप बजने लगती हैं घंटियां

Virbhadra temple rishikesh- देवभूमि कहे जाने वाला उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के साथ-साथ धार्मिक दृष्टि के लिए भी जाना जाता है। जिस वजह से यहां हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। उत्तराखंड के ऋषिकेश में एक ऐसा मंदिर है, जो अपने चमत्कारी रहस्य के लिए जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर वीरभद्र महादेव के नाम से विख्यात है।

वीरभद्र की उत्पत्ति कथा (Virbhadra temple rishikesh)

भगवान शिव के ससुर दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया, जिसमें सभी ऋषि, मुनी, देवी और देवताओं को बुलाया था। पर इस यज्ञ में दक्ष ने शिव और सती को नहीं बुलाया था। अपने पति का घोर अपमान देखकर सती ने यज्ञ के भीतर ही कूदकर आत्मदाह कर लिया था। भगवान शंकर को जब यह समाचार मिला तो वे बहुत क्रोधित हो गए। उन्होंने दक्ष, उसकी सेना और वहां उपस्थित उनके सभी सलाहकारों को दंड देने के लिए अपनी जटा से वीरभद्र नामक एक गण उत्पन्न किया।Virbhadra temple rishikesh
उत्पन्न होते ही वीरभद्र शिव की आज्ञा से तेजी से यज्ञ स्थल पहुंचा और उसने वहां की भूमि को रक्त से लाल कर दिया और बाद में दक्ष को पकड़कर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। इस घटना का वर्णन स्कंद, शिव और देवी पुराण के बाद देव संहिता में मिलता है। बाद में ब्रह्माजी और विष्णुजी फिर कैलाश पर्वत पर गए और उन्होंने महादेव से विनयकर अपने क्रोध को शांत करने को कहा और राजा दक्ष को जीवन देकर यज्ञ को संपन्न करने का निवेदन किया। बहुत प्रार्थना करने के बाद भगवान शिव ने उनकी बात मान ली और दक्ष के धड़ से बकरे का सिर जोड़कर उसे जीवनदान दिया, जिसके बाद यह यज्ञ पूरा हुआ।

मंदिर का रहस्य

मंदिर का इतिहास 2000 साल से पुराना बताया जाता है। मंदिर के बारे में कहा जाता है कि जब वीरभद्र का क्रोध शांत नहीं हुआ, तब भगवान शिव ने इसी स्थान पर वीरभद्र का क्रोध शांत किया था और वीरभद्र ने ही यहां पर शिवलिंग की स्थापना की थी। जिसे वर्तमान में वीरभद्रेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।
सावन के महीने में यहां सैकड़ों श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना जरूर पूरी होती है। इस मंदिर में अपने आप घंटियों के बजने का चमत्कार होता है। इस बारे में मंदिर के व्यवस्थापक राजेंद्र गिरी बताते हैं कि कई बार उन्होंने और मंदिर पहुंचे श्रद्धालुओं ने इसे साक्षात महसूस किया है। इस मंदिर का इतिहास 2000 साल से भी अधिक पुराना है। कई साल पहले यहां मंदिर परिसर में पुरातात्विक खुदाई के दौरान पुराने मंदिरों के अवशेष भी मिल चुके हैं।

मंदिर कैसे पहुंचें

वीरभद्र महादेव मंदिर नीलकंठ-ऋषिकेश राजमार्ग से 2 किलोमीटर की दूर पर स्थित है। आप इस मंदिर पर रेलवे स्टेशन से भी पहुंच सकते हो, जिसका नाम वीरभद्र स्टेशन है। यह स्टेशन राजमार्ग पर स्थित है जो मंदिर से 2 किलोमीटर दूरी पर है। मीरा नगर और टिहरी विश्व पिट इसके पास के गांव हैं। देहरादून का जॉली ग्रांट हवाई अड्डे से इस मंदिर की दूरी 25 किलोमीटर है।

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