इस पर्वत पर रहते हैं भगवान शिव, चमत्कारिक रूप से बनता है ओम

जब हम कैलाश-मानसरोवर यात्रा पर जाते हैं तो रास्ते में हमें एक चमत्कारिक पर्वत दिखाई देता है, जिस पर प्राकृतिक रूप से ॐ लिखा हुआ नजर आता है। इस पर्वत को ओम पर्वत के नाम से जाना जाता है। ओम पर्वत को लिटिल कैलाश, आदि कैलाश, बाबा कैलाश और जोंगलिंगकोंग के नाम से भी जाना जाता है। ओम पर्वत भारत और तिब्बत सीमा के पास में स्थित है, जो एक शानदार दृश्य प्रदान करता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हिमालय पर कुल 8 जगह ऐसी हैं, जहां पर प्राकृतिक रूप से ओम की आकृति बनी हुई है। हालांकि अभी तक सिर्फ ओम पर्वत पर बनी आकृति के बारे में ही पता चल पाया है। बाबा अमरनाथ की ही तरह यहां पर बर्फ इस तरह से गिरती है कि स्वयं ही पवित्र हिंदू चिन्ह ओम का निर्माण हो जाता है। इसीलिए इस पर्वत को ओम पर्वत के नाम से जाना जाता है।

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह एक आध्यात्मिक जगह है और यहां पर भगवान शिव का वास है। पर्वत पर देवता अदृश्य रूप से ध्यान में लीन रहते हैं। कई तीर्थ यात्रियों का मानना है कि कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर जाने के दौरान ओम पर्वत के पास पहुंचने के दौरान ओम के ध्वनी सुनाई देती है। यहां पर आने से मन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। ओम पर्वत से काली नदी, घने जंगलों और नारायण आश्रम का सुन्दर दृश्य दिखाई देता है।

ओम पर्वत की समुद्र तल से ऊंचाई लगभग 6,191 मीटर है। कहा जाता है कि आज तक इस पर्वत पर कोई नहीं गया है। हालांकि इस पर पहुंचने का सबसे पहला प्रयास भारतीय ब्रिटिश टीम ने किया था। अक्तूबर 2004 में टीम ने इस पर्वत पर जाने के प्रयास किया था। टीम ने तय किया था कि वह धार्मिक मान्यता का सम्मान करते हुए ओम पर्वत की चोटी पर पहुंचने से करीब 30 फिट पहले ही रुक जाएगी, लेकिन खराब मौसम के कारण उन्हें चोटी से 660 फिट पहले ही लौट कर आना पड़ा। इसके बाद 2008 में एक अन्य टीम ने भी यहां जाने का प्रयास किया, लेकिन वह भी धार्मिक मान्यता का सम्मान करते हुए ओम पर्वत की चोटी पर पहुंचने से पहले ही लौट आए।

कैसे पहुंचें ओम पर्वत

चमत्कारिक ओम पर्वत तक पहुंचने के लिए सबसे पहले श्रद्धालु दिल्ली से अल्मोड़ा तक पहुचंते हैं। इसके बाद अल्मोड़ा में रात्रि विश्राम के बाद डीडीहाट और फिर धारचूला पहुंचते हैं। फिर धारचूला से टैक्सी की मदद से कच्ची सड़क द्वारा लगभग 40 दूर लखनपुर पहुंचते हैं। लखनपुर के बाद श्रद्धालु पैदल ही बुद्धि, छियालेक, गुंजी, कुट्टी होते हुए ज्योलिंगकांग पहुंचते हैं। ज्योलिंगकांग से ही आदी कैलाश के दर्शन होते हैं। आदी कैलाश पर्वत की जड़ में गौरीकुंड स्थापित है।

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