2000 साल से भी अधिक पुराना है ऋषिकेश का यह मंदिर, अपने आप बजने लगती हैं घंटियां

मंदिर का इतिहास 2000 साल से पुराना बताया जाता है। सावन के महीने में यहां सैकड़ों श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना जरूर पूरी होती है।

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युधिष्ठिर ने की थी लाखामंडल मंदिर की स्थापना, यहां पुनः जीवित हो जाता है व्यक्ति

यह वही जगह है, जहां पर दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए ‘लक्षग्रह’ का निर्माण करवाया था। कहा जाता है कि अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां आए थे। इस दौरान स्वयं युधिष्ठिर ने शिवलिंग को स्थापित किया था। इस शिवलिंग को महामंडेश्वर नाम से जाना जाता है।

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बद्रीनाथ धाम के पास व्यास गुफा में गणेश जी ने लिखी थी महाभारत

यह वही गुफा है, जहां पर महर्षि वेद व्यास जी ने महाभारत को बोला था और भगवान गणेश ने उसे लिखा था। हिमालय की सघन वादियों के बीच स्थित इस गुफा में वेद व्यास जी जैसा-जैसा बोलते गए और भगवान गणेश उसे लिखते रहें। इस तरह पवित्र महाकाव्य महाभारत की रचना हुई।

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चार धाम और पंच केदारों में प्रमुख है केदारनाथ मंदिर

भगवान शिव को समर्पित यह विशाल मंदिर भूरे रंग के कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। मंदिर का निर्माण लगभग 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर किया गया है। केदारनाथ मंदिर में स्थित ज्योतिर्लिंग की ऊंचाई 3584 मीटर है।

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शक्तिपीठ सुरकंडा देवी से नजर आता है चारों धामों की पहाड़ियों का दुर्लभ दृश्य

घने जंगलों से घिरे हुए इस प्रसिद्द धार्मिक स्थल से हिमालय का खूबसूरत नजारा देखने को मिलता है। इसके अलावा यहां से बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमनोत्री अर्थात चारों धामों की पहाड़ियों का दुर्लभ नजारा देखने को मिलता है।

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ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर होता है गंगा, यमुना और सरस्वती नदी का संगम

जरा नामक एक शिकारी के तीर से चोट लगने के बाद भगवान श्री कृष्ण यहां आए थे। इस स्थान को भगवान कृष्ण का अंतिम संस्कार स्थल भी माना जाता है। यहां आने वाले तीर्थ यात्री इस जगह पर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंड श्राद्ध नामक “कर्मकांड” भी करते हैं।

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पांडुकेश्वर में है योग ध्यान बद्री मंदिर, यहीं हुआ था पांडवों का जन्म

माना जाता है कि भगवान विष्णु की कांस्य की प्रतिमा को इस स्थान पर महाभारत के नायक पांच पांडवों के पिता राजा पांडु ने स्थापित किया था। कई लोगों का मानना है कि यह वहीँ स्थान है जहां पर पांडव पैदा हुए थे और राजा पांडु ने इस स्थान पर मोक्ष प्राप्त किया था।

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देहरादून में है प्रसिद्द टपकेश्वर महादेव मंदिर, यहां स्थित है स्वयंभू शिवलिंग

टपकेश्वर मंदिर देवताओं का निवास स्थान है। यहीं पर देवता भगवान शिव का ध्यान किया करते थे। यहां स्थित पवित्र गुफा में भगवान शिव ने देवताओं को देवेश्वर के रूप में दर्शन दिए थे। इसके बाद भगवान शिव ने ऋषियों को दर्शन दिए।

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कण्व ऋषि की तपोस्थली है कण्वाश्रम, यहीं हुआ था शकुंतला पुत्र भरत का जन्म

प्राचीन समय में हिन्दू धर्म के पवित्र धार्मिक स्थल बद्रीनाथ धाम और केदारनाथ धाम यात्रा की शुरुआत कण्वाश्रम से शुरू हुआ करती थी। इसके अलावा मालिनी नदी के तट पर स्थित कण्वाश्रम में तीर्थ श्रद्धालुओं का महाकुम्भ भी हुआ करता था।

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लोगों के विश्वास और आस्था का प्रतीक है चमत्कारिक संतला देवी मंदिर

मुगलों से लड़ते-लड़ते जब संतला देवी और उनके भाई को एहसास हुआ कि वे मुगलों से लड़ने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्होंने इसी स्थान पर अपने दोनों हथियार फेंक दिये और प्रार्थना शुरू कर दी। उसी समय चारों ओर दिव्य प्रकाश फैला और वह दोनों पत्थर की मूर्तियों में बदल गये।

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