सप्त बद्री का समूह है चमोली गढ़वाल, बद्रीनाथ से करें यात्रा की शुरुआत

सप्त बद्री सात पवित्र हिंदू मंदिरों का एक समूह है जो उत्तराखंड में गढ़वाल में भगवान विष्णु को समर्पित है। बद्रीनाथ मंदिर, जिसे बद्री विशाल कहा जाता है सात तीर्थस्थलों का प्राथमिक मंदिर है। इसके बाद छह अन्य आदि बद्री, भव्य बद्री, योगध्यान बद्री, वृद्धा बद्री, अर्ध बद्री और ध्यान बद्री मंदिर शामिल हैं। 

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इस स्थान पर माता सीता ने ली थी भू-समाधी, लगता है ऐतिहासिक मेला

लोगों की मान्यता है कि फलस्वाड़ी में जिस जगह पर माता सीता ने भू-समाधी ली थी, वहां पर बाद में माता सीता का मंदिर बनाया गया था, लेकिन आगे चलाकर वह मंदिर भी धरती में समा गया था।

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हाईटेक तकनीक से तैयार होगा ऋषिकेश का नया लक्ष्मणझूला पुल, दिखेगी केदारनाथ मंदिर की झलक

नए लक्ष्मणझूला पुल पर केदारनाथ मंदिर के दोनों किनारों पर लिफ्ट लगेगी। इसमें बैठकर 20 मीटर ऊपर मंदिर के शीर्ष छोर तक पहुंचा जा सकेगा। यहां से दूरबीन के माध्यम से ऋषिकेश को निहारा जा सकेगा।

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उत्तराखंड के इतिहास में प्राचीन सिद्धपीठों में से एक है गौरादेवी देवलगढ़

गौरा देवी (गैरजादेवी) मंदिर की गणना प्राचीन सिद्धपीठों में की जाती है। सातवीं शताब्दी का बना यह पाषाण मंदिर प्राचीन वास्तुकला का अतुलनीय उदाहरण है। राजराजेश्वरी गढ़वाल के राजवंश की कुलदेवी थीं, इसलिये उनकी पूजा देवलगढ़ स्थित राजमहल के पूजागृह में होती थी।

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हर मुराद पूरी होती है पिथौरागढ़ के इस मंदिर में, व्यू पाइंट से दिखता है खूबसूरत नजारा

कामख्या देवी मंदिर की स्थापना 1972 में मदन मोहन शर्मा के प्रयासों से हुई थी। 1972 में मदन मोहन शर्मा ने जयपुर से छः सिरोंवाली मूर्ति लाकर यहां स्थापित की थी। कामाख्या देवी को नारीत्व के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है।

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शीतकाल के लिए बंद हुए चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ मंदिर के कपाट

शीतकाल के दौरान भगवान रुद्रनाथ गोपेश्वर में गोपीनाथ मंदिर में विराजते हैं। पंचकेदारों में शामिल चतुर्थ केदार भगवान रुद्रनाथ का प्राचीन मंदिर मंडल घाटी में समुद्रतल से 11800 फीट की ऊंचाई पर सुरम्य बुग्यालों के बीच स्थित है।

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प्रसिद्ध सिद्धबली मेला में 13 से 15 दिसंबर तक होगा महोत्सव, वेद ऋचाओं से गूंजेंगे पहाड़

हर साल की तरह इस बार भी श्री सिद्धबली बाबा मंदिर का वार्षिक अनुष्ठान किया जा रहा है ​जो कि 13 दिसंबर से 15 दिसंबर 2019 तक आयोजित किया जाएगा। प्रसिद्ध सिद्धपीठ श्री सिद्धबाबा के वार्षिक महोत्सव के लिए मंदिर समिति ने समितियों का गठन कर तैयारियां शुरू कर दी हैं।

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2000 साल से भी अधिक पुराना है ऋषिकेश का यह मंदिर, अपने आप बजने लगती हैं घंटियां

मंदिर का इतिहास 2000 साल से पुराना बताया जाता है। सावन के महीने में यहां सैकड़ों श्रद्धालु भगवान शिव की आराधना करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मनोकामना जरूर पूरी होती है।

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युधिष्ठिर ने की थी लाखामंडल मंदिर की स्थापना, यहां पुनः जीवित हो जाता है व्यक्ति

यह वही जगह है, जहां पर दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए ‘लक्षग्रह’ का निर्माण करवाया था। कहा जाता है कि अपने अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां आए थे। इस दौरान स्वयं युधिष्ठिर ने शिवलिंग को स्थापित किया था। इस शिवलिंग को महामंडेश्वर नाम से जाना जाता है।

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बद्रीनाथ धाम के पास व्यास गुफा में गणेश जी ने लिखी थी महाभारत

यह वही गुफा है, जहां पर महर्षि वेद व्यास जी ने महाभारत को बोला था और भगवान गणेश ने उसे लिखा था। हिमालय की सघन वादियों के बीच स्थित इस गुफा में वेद व्यास जी जैसा-जैसा बोलते गए और भगवान गणेश उसे लिखते रहें। इस तरह पवित्र महाकाव्य महाभारत की रचना हुई।

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चार धाम और पंच केदारों में प्रमुख है केदारनाथ मंदिर

भगवान शिव को समर्पित यह विशाल मंदिर भूरे रंग के कटवां पत्थरों के विशाल शिलाखंडों को जोड़कर बनाया गया है। मंदिर का निर्माण लगभग 6 फुट ऊंचे चबूतरे पर किया गया है। केदारनाथ मंदिर में स्थित ज्योतिर्लिंग की ऊंचाई 3584 मीटर है।

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