ब्रिटिश अधिकारियों की कब्रों तक उनके वंशजों को पहुंचाएगा उत्तराखंड पर्यटन विभाग - THE HIMALAYAN DIARY

ब्रिटिश अधिकारियों की कब्रों तक उनके वंशजों को पहुंचाएगा उत्तराखंड पर्यटन विभाग

प्रदेश में विदेशी पर्यटन को बढ़ावा देने और ब्रिटिश अधिकारियों की कब्र को उनके वंशजों तक पहुंचाने के लिए उत्तराखंड पर्यटन विभाग नई पहल शुरू करने जा रहा है। इस पहल के तहत पर्यटन विभाग ब्रिटिशकाल के समय नैनीताल, मसूरी, रानीखेत व लैंसडौन आदि इलाकों में अपने जीवन के अंतिम दिन गुजारने वाले ब्रिटिश अधिकारियों की कब्रों की पहचान करेगी। कब्रों की पहचान करने के बाद पर्यटन विभाग उन अधिकारियों के वंशजों को तलाश करेगा। ऐसा करने के पीछे पर्यटन विभाग का उद्देश्य यह है कि इससे ब्रिटिश अधिकारियों के वंशज उत्तराखंड आएंगे और इससे प्रदेश के पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

भारत की आजादी से पहले उत्तराखंड में बड़ी संख्या में विदेशी लोग रहते थे। इनमें ब्रिटेन, फ्रांस व न्यूजीलैंड आदि देशों के नागरिक शामिल थे। कई अधिकारीयों ने यहीं अपने जीवन की अंतिम सांस ली। इन्हें दफनाने के लिए यहीं कब्रिस्तान बनाए गए थे। 18वीं सदी में बनाए गए इन कब्रिस्तानों में कुछ प्रसिद्ध हस्तियों की कब्र भी बनी हुई हैं। अंग्रेजों के खिलाफ महारानी लक्ष्मी बाई का मुकदमा लडऩे वाले आस्ट्रेलियाई जॉन लैंग की कब्र भी यहां बनी हुई है। इसके अलावा कई ब्रिटिश सैन्य अधिकारी व उनके परिजनों की कब्र भी यहां मौजूद हैं। इनमे से कई कब्र के बारे में उनके वंशजों को पता ही नहीं हैं।

बीते कुछ वर्षों में कई विदेशी अपने परिजनों की कब्र की खोज में उत्तराखंड के इन कब्रिस्तानों तक पहुंचें हैं। इनमे से कुछ को सफलता भी मिली हैं। हालांकि उत्तराखंड के गठन के बाद कई कब्रें अब तक नष्ट भी हो चुकी हैं। इसके अलावा कब्रिस्तानों में इतनी कब्रें हैं कि उनकी पहचान करना भी पर्यटन विभाग के सामने बड़ी चुनौती होगी। पर्यटन विभाग का कहना है कि वह पुराने डॉक्यूमेंट्स के जरिए इस बात की खोज करेंगे कि इन कब्रों के अंदर बंद लोगों के वंशज कहां रहते हैं। हालांकि ऐसा करना पर्यटन विभाग के लिए आसन नहीं होगा। बता दे कि ब्रिटिशकाल के मसूरी में 2 और नैनीताल में 5 कब्र बने हुई हैं।

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